Thursday, July 16, 2009

वो मिरे दिल में गज़ल लिखता है बस मुस्कान से

ये आप सब का स्नेह है जो मुझे निरंतर लिखने की प्रेरणा देता है। पिछले दिनों गुरूपूर्णिमा पर गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी को दो शेर समर्पित किया था। आज उस पूरी गज़ल के साथ हाज़िर हूं। और हां, एक बात और, कुछ लोगों को उत्सुकता है मेरे बारे में जानने की पर मैंने अपने ब्लाग प्रोफ़ाईल में सिर्फ़ एक ही लाइन लिखा है। यदि उत्सुकता आज तक बरकरार हो तो कुछ और पहलू मेरी जिंदगी के जानने को मिल सकते हैं ताऊ जी के ब्लाग पर आज प्रकाशित परिचयनामा में। आइये अब और देरी न करते हुये सीधे गज़ल की ओर रूख करते हैं।

मैं जिन्हे कहता था अपना महफ़िलों में शान से
दोस्‍त वो ही मुश्‍किलों में बन गये अन्जान से

कौन कहता है कि डरकर खींच लूंगा पांव मैं

ले के कश्‍ती चल पड़ा हूं कह दो ये तूफान से

लीक पर चलना मिरी फ़ितरत में है शामिल नहीं
जंग जारी है मिरी अल्लाह से, भगवान से


कौन करता याद बिस्मिल और भगत को आजकल
हो गये मेले शहीदों के सभी वीरान से

उसको काग़ज़ और क़लम की क्‍या ज़रूरत है भला
वो मिरे दिल में गज़ल लिखता है बस मुस्कान से

दर्द से बेहाल जनता द्वार पर कब से खड़ी
किन्‍तु फुरसत है कहां राजा को नाच और गान से

15 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

लीक पर चलना मिरी फ़ितरत में है शामिल नहीं
जंग जारी है मिरी अल्लाह से, भगवान से

बहुत सुन्दर यह शेर मैंने रख लिया आपका ..:) बहुत बढ़िया लगी आपकी यह गजल

संजीव गौतम said...

मैं जिन्हे कहता था अपना महफ़िलों में शान से
दोस्‍त वो ही मुश्‍किलों में बन गये अन्जान से

कौन कहता है कि डरकर खींच लूंगा पांव मैं
ले के कश्‍ती चल पड़ा हूं कह दो ये तूफान से
bahut achchhe sher aaye hain badhaaee

"अर्श" said...

क्या बात है गुरु भाई क्या खूब ग़ज़ल कही है आपने वेसे सच कहूँ तो मैं इस ग़ज़ल का इंतज़ार कर ही रहा था ...
लीक पर चलना मिरी फ़ितरत में है शामिल नहीं
जंग जारी है मिरी अल्लाह से, भगवान से..

पूरी ग़ज़ल ही मुकम्मल है बहोत ही खूबसूरती से आपने हक़ अदा किया है बहोत बहोत बधाई ...


अर्श

ओम आर्य said...

bahut hi lik se hatake ke wichar hai
bhagawan aapako lik se hatkar chalane ki taakat de ........achchhi baate kahi hai aapane ......ek achchhi rachcna

गौतम राजरिशी said...

अभी-अभी तुम्हारा साक्षात्कार पढ़ कर आ रहा हूँ।
गज़ब का था...भूत वाली बात पे मैं यकीन करता हूँ।
और ग़ज़ल तो माशल्लाह है....उस अल्लाह से, भगवान से वाले शेर के तो हम पहले से ही दीवाने हैं। मतला भी अच्छा बन पड़ा है...
बधाई !

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर गजल लिखी आप ने
धन्यवाद

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया गजल !!

mehek said...

कौन करता याद बिस्मिल और भगत को आजकल
हो गये मेले शहीदों के सभी वीरान से

उसको काग़ज़ और क़लम की क्‍या ज़रूरत है भला
वो मिरे दिल में गज़ल लिखता है बस मुस्कान से

waah bahut hi lajawab.

venus kesari said...

हर लिहाज से खूबसूरत गजल

लीक पर चलना मिरी फ़ितरत में है शामिल नहीं
जंग जारी है मिरी अल्लाह से, भगवान से

इसको पढ़ कर तो दिल वाह वाह हो जाता है

रवि भाई मक्ता पढने में कुछ अटक रहा है

वीनस केसरी

Udan Tashtari said...

लीक पर चलना मिरी फ़ितरत में है शामिल नहीं
जंग जारी है मिरी अल्लाह से, भगवान से

--जबरदस्त भाई!! बहुत गज़ब!

पंकज सुबीर said...

रवि वीनस ने एक प्रश्‍न उठाया है कि किन्‍तु फुरसत 2122 है कहां रा 2122 जा को नाच और ( इसका वजन किस प्रकार से 2122 किया जाऐगा ) गान से 212 । नाच का वजन है 21 और का वजन है 21 तो किस प्रकार से हम इनको 22 के स्‍थान पर ले सकते हैं । इसको स्‍पष्‍ट करने के लिये पुरानी कक्षाओं का सहारा लेना होगा ।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

उसको काग़ज़ और क़लम की क्‍या ज़रूरत है भला
वो मिरे दिल में गज़ल लिखता है बस मुस्कान से

दर्द से बेहाल जनता द्वार पर कब से खड़ी
किन्‍तु फुरसत है कहां राजा को नाच और गान से

उम्दा

कंचन सिंह चौहान said...

लीक पर चलना मिरी फ़ितरत में है शामिल नहीं
जंग जारी है मिरी अल्लाह से, भगवान से

कौन करता याद बिस्मिल और भगत को आजकल
हो गये मेले शहीदों के सभी वीरान से

उसको काग़ज़ और क़लम की क्‍या ज़रूरत है भला
वो मिरे दिल में गज़ल लिखता है बस मुस्कान से

ये तीनो ही शेर बेमिसाल रविकांत जी...! आप की लेखनी की कायल हूँ और रोज होती हूँ..!

Manish Kumar said...

उसको काग़ज़ और क़लम की क्‍या ज़रूरत है भला
वो मिरे दिल में गज़ल लिखता है बस मुस्कान से


ये शेर खास तौर पर पसंद आया !

ताऊ रामपुरिया said...

लीक पर चलना मिरी फ़ितरत में है शामिल नहीं
जंग जारी है मिरी अल्लाह से, भगवान से

वाह बहुत खूबसूरत रचना. शुभकामनाएं.

रामराम.