Monday, November 9, 2009

जितने भी थे गवाह वो सारे मुकर गये....

मित्रों, आज ये मेरी पचासवीं पोस्ट हाजिर है। कच्छप-गति से चलते-चलते आपके दुआओं के सहारे यहां तक आ पहुंचा हूं। इसी कड़ी में आज पढ़िये ये गज़ल जो आदरणीय प्राण शर्मा जी के सुझावों और आशीर्वाद के बाद कहने लायक बन पाई है-

कुछ बिक गये, कुछ एक जमाने से डर गये
जितने भी थे गवाह वो सारे मुकर गये


हमने तमाम उम्र फ़रिश्ता कहा जिन्हे
ख्वाबों के पंछियों की वो पांखें कुतर गये


कुर्सी के दांव-पेंच का आलम ये देखिये
जिस ओर की हवा थी, महाशय उधर गये


सच उनके घर गुनाह में शामिल है इसलिये

जब भी गये हैं लेके हथेली पे सर गये


मेरी तो कोई बात भी उनसे छुपी नहीं
हैरत से देखते हैं जो देने खबर गये


दुनिया की हर बुराई थी जिनमें भरी हुई
सत्ता के शुद्ध-जल से वो पापी भी तर गये


मेरे अजीज मुझसे सरेराह जो मिले
मुंह फ़ेरकर जनाब मजे से गुज़र गये

Tuesday, November 3, 2009

बोलो जय सियाराम....

मित्रों, आज प्रस्तुत करता हूं-सीधे-सादे शब्दों में एक रचना। बात आप तक पहूंचे तो टिप्पणियों से सूचित करें-

डोली लूट गये खुद कहार, बोलो जय सियाराम
भारतमाता भई लाचार, बोलो जय सियाराम


विद्यालय से कालेजों तक, करता कौन पढ़ाई
डिग्री की चिंता क्या करनी, ये कलियुग है भाई

सब है बिकता खुले बाजार, बोलो जय सियाराम

ले लो रूपये के दो-चार, बोलो जय सियाराम


मन की कोई पूछ नहीं है, तन का ऊंचा आसन
जितने कम जो कपड़े पहने, उतना सुंदर फ़ैशन

रूप की महिमा अपरंपार, बोलो जय सियाराम

इशारों पर नाचे संसार, बोलो जय सियाराम


बस कागज़ पर दिखता है जो, वो विकास है कैसा
बिजली, सड़क और पानी का, था जितना भी पैसा

मंत्री, अफ़सर गये डकार, बोलो जय सियाराम

कि कितनी अच्छी है सरकार, बोलो जय सियाराम


जीत गये तो भूल गये वो, सभी चुनावी वादे
बदल गये गिरगिट-सा देखो, जो थे सीधे-सादे

हुआ जनता का बंटाधार, बोलो जय सियाराम
बड़े लोगों का बेड़ा पार, बोलो जय सियाराम


कहां और किस ओर गया है, आज ये भारतवर्ष
चार्वाक का दर्शन बन गया, एकमात्र आदर्श

घी पीते हैं लेकर उधार, बोलो जय सियाराम

वो यू पी हो या हो बिहार, बोलो जय सियाराम

Friday, October 30, 2009

आंसुओं में डूबकर उस पार जाना चाहता हूं.....

बहुत दिनों बाद आप सबसे मुखातिब हूं इसलिये बहुत सारी बातें भी हैं सुनाने को-कुछ, जो हुआ और कुछ, जो इस होने का अर्थ निकलता है। २० अक्तूबर के लगभग फ़ुरसतिया जी का फोन आया कि इलाहाबाद में ब्लागरों का सम्मेलन है। हमने क्षमा सहित निवेदन कर दिया कि उन्ही दिनों हमारे यहां भी उत्सव होनेवाला है और उत्सव भी क्या ऐसा समझें कि पूरा-पूरा देवराज इंद्र का दरबार सजनेवाला है। जब कस्तूरी अपने घर ही हो तो उसे खोजने इलाहाबाद क्या जायें, असल कुंभ तो यहां लगनेवाला है। जल्द ही सुरबालाओं के कदम से ये तपोवन झंकृत हो उठा। आज अगर बाबा तुलसीदास होते तो गा रहे होते-

वन बाग उपवन वाटिका सर कूप वापी सोहहिं
नर नाग सुर गंधर्व-कन्या रूप मुनि मन मोहहिं


तो इस तरह से शुरू हुआ चार दिनों तक चलनेवाला हमारा वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम। पूरे कार्यक्रम के विस्तृत विवरण में तो मेरी खास दिलचस्पी नहीं है। हां, कुछ बातें जरूर साझा करने लायक हैं। सबसे पहले तो ये कि एक अपराध मुझसे होते-होते बचा या कहें कि परमात्मा ने बचा लिया। किसी विशेष कार्यक्रम में एक खास आत्मीय जन को बुलाने की प्रबल इच्छा थी पर किसी कारण से संभव न हो पाया। मन में एक पीड़ा का भाव था लेकिन कार्य्क्रम समापन के बाद मैंने ईश्वर का धन्यवाद दिया कि तू जो करता है ठीक ही करता है। मन में कई प्रश्न भी उठे -क्या कविता के लिये विषय का इतना अभाव हो गया है कि कवियों को अपनी समस्त प्रतिभा ये बताने में नष्ट करनी पड़े कि किसी अभिनेत्री ने विदेशी को चुंबन देकर भारतीय संस्कृति का अपमान किया है। और बताने का ढंग भी ऐसा कि साफ समझ आता है कि उन्हे भारतीय संस्कृति से तो क्या लेना देना ? असल पीड़ा तो ये है कि इस उपहार से वे क्यों वंचित रह गय? उनका दर्द कि हम भारतीय क्या मर गये थे? अब चूंकि ये दर्द तो कई भारतीयों का है इसलिये तालियां तो खूब मिली बस कहीं कविता भर न मिली। ये तो सिर्फ़ एक उदाहरण है, पूरा कार्यक्रम सुनकर तो ऐसा लग रहा था जैसे कवि-सम्मेलन न होकर कोई घटिया कामेडी सिनेमा चल रहा हो। खैर मैं निंदा-रस का रसिक नहीं हूं इसलिये इस अध्याय को यहीं बंद करते हैं और मिलते हैं दो प्रतिभाओं से जिनमें काव्य का बीज अंकुर फोड़ रहा है। एक तो अमित जी हैं जिनके बारे में पहले भी बताया है आपको और दूसरे हैं भारत भूषण। अभी-अभी अमित ने किसी कारवाले को फूल बेचने की कोशिश करते बच्चे को लक्ष्य कर लिखा है-

मेरा क्या बाबूजी मैं तो बस सड़क का शोर हूं
आप
ले जाएं इन्हे तनहाइओं में गुनगुनाएं


कल बड़ा हो जाऊंगा तो शक करेंगे आप भी

आज बच्चा ही समझकर रात की रोटी खिलाएं


बेचता सड़कों पर बचपन कुछ व्यथित संवेदनाएं


जहां तक भारत-भूषण की बात है, ये बंधु इतना सुंदर गाते हैं कि आप प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकते। पिछले दिनों इन्होने अपना ताजा गीत सुनाया-

वह शून्य जिससे सृष्टि आती
मैं
भी पाना चाहता हूं

आंसुओं में डूबकर

उस पार जाना चाहता हूं


इनसे मिलकर बस एक ही काम किया जा सकता था जो मैंने कर दिया। शीघ्र ही दोनों गुरूकुल में दाखिले की अर्जी देने वाले हैं। इनके बारे में बाकी बातें बाद में।

Saturday, October 17, 2009

मुझसे कहते वही कहानी, शुभदे ! चंचल नयन तुम्हारे

आप सबको दीपावली की शुभकामनाएं। जीवन के समस्त अंधियारे दूर हों इस मंगलकामना के साथ। चलते-चलते एक छोटा गीत, बतायें कैसा बना है ?

अमर-कथा जो कभी सुनाई शिव ने चुपके उमा-कान में
मुझसे कहते वही कहानी, शुभदे ! चंचल नयन तुम्हारे

रोम-रोम आभारी मेरा तुमने इतना प्यार किया है
दुविधाओं के महाजाल में नीर-क्षीर व्यवहार किया है
तुमको परिभाषित क्या करता ! सभी विशेषण छोटे निकले
पकड़ तर्जनी तेरी मैंने हर दुर्गम पथ पार किया है

मुखर हुई हो जैसे प्रमुदित देवालय की कोई प्रतिमा
वेद-मंत्र से पावन लगते, प्रियंवदे ! ये वचन तुम्हारे

निशिदिन मन की टेर यही है जैसे भी हो प्रिय तुम आओ
तृषित अधर अतिविकल आज हैं आकर सुधा धार बरसाओ
सौंप दिया सब कुछ तुम पर मुझपर मेरा अधिकार कहां है
मैं तो एक बांसुरी जैसा जो चाहो सो गीत बजाओ

खोल हृदय की बंद किवाड़ें, नेह-द्रव्य से भर दो झोली
याचक बनकर आया हूं मैं, प्राणवल्लभे ! भवन तुम्हारे

Saturday, October 10, 2009

जन्मदिन मुबारक हो

११ अक्टूबर १९७५ का दिन है। हवा में चंदन की खुश्बू है, उपवन में फूल झूम रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे पूरी प्रकृतिउत्सव मना रही हो। अभी-अभी एक बालक का जन्म हुआ है। घर में सभी आनंदित हैं, बधाईयों का तांता लगा है।आंगन से सोहर की आवाज आती है (साभार: पिया के गांव) -


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इतिहास चुपके से इस क्षण को चिन्हित कर लेता है। बालक धीरे-धीरे बड़ा होता है। किशोरावस्था गई है।किशोर की अभिरूचियां देखकर लगता है जैसे इस तरूण से सरस्वती को कुछ अभीष्ट है। गीत, गज़लों से ऐसालगाव हो गया है मानो गज़ल ही खाना, ओढ़ना, बिछाना जीवन का लक्ष्य हो-


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ग्यारवीं कक्षा में पंहुच चुके इस होनहार युवक को शायरी का कीड़ा काटता है। दिल के मचलते अरमान कागज़ परउतरने लगते हैं। एक असहाय
पेड़ का दर्द -

एक पेड़ बेचारा पेड़, बारिश में भीगता पेड़, गर्मी में सूखता पेड़

इस नौजवान के हृदय में तीर की तरह चुभता है और वहीं से काव्य-यात्रा शुरू होती है। इतिहास फ़िर से इस क्षण कोचिन्हित कर लेता है। मुहब्बत के शेरों ने डायरी के पन्ने भरने शुरू कर दिये हैं। दुश्मन ज़माने की नज़र पड़ती हैऔर सुनने में आता है कि लड़का राह भटक गया है। संदेह है कि किसी मेनका ने इस विश्वामित्र की तपस्या भंग करदी है। अरे यह क्या!! इश्क सर पर हाथ रखे रो रहा है, गज़ल एक कोने में उदास बैठी है। कुटिल आक्षेपों से विकलहोकर खुद ही डायरी को आग लगा दी है और दिनकर जी की पंक्तियां गुनगुना रहा है-

सीखी जगती ने जलन प्रेम पर
जब से बलि होना सीखा
फूलों ने बाहर हंसी और
भीतर-भीतर रोना सीखा

लेकिन कब तक? कहते हैं कला दबाने से और निखरती है।

बंधनों से होकर भयभीत
किन्तु
क्या
हार सका अनुराग ?
मानकर
किस बंधन का दर्प

छोड़ सकती ज्वाला को आग?

शीघ्र ही
देह की देहरी नाम से दूसरी कामायनी अस्तित्व में आती है। पूरी पचास गज़लों के साथपुरूष के अंतरंग संबंधों को आधार बना कर लिखी हैं। ये कच्चे और भावुक कवि मन की अभिव्यक्तियां हैं शायद बीस या इक्कीस साल के युवा मन की -


जिस्म को यूं ही गुनगुनाने दो

मुझको खुद में ही पिघल जाने दो

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जलते हुए गुलमोहर की ठंडी सी छांहें देखीं थीं

साथ किसी के हमने भी तो चांद सी बांहे देखीं थी


शायरी का सफ़र जारी है। स्त्री-पुरूष संबंधों का रहस्य, रोमांच, उलझन लेखनी के विषय बनते हैं और खंड-काव्य तुम्हारे लिये का जन्म होता है।

सौ छंदों में स्त्री पुरुष की प्रणयक्रिया को प्रतीकों के माध्यम सेउकेरने का प्रयास उसी बीसइक्कीस की उम्र में विषय एककिशोर के ‍‍ ‍ प्रथम प्रणय के अनुभव

महाप्रणय के महाग्रंथ का लेखाकरण प्रगति पर था तब

मसी नहीं थी, क़लम नहीं थी किन्‍तु कार्य उन्‍नति पर था तब

तरल हो गईं दो कायाएं मिलकर बनने एक रसायन


कल्पित प्रारूपों पर मानो इच्छित सा निर्माण हुआ था

बोधि वृक्ष की छाया ने फिर योगी को निर्वाण दिया था

सब कुछ विस्‍मृत था, स्‍मृत था केवल प्रणय कर्म निर्वाहन


जगा रहा शमशान निशा में, शव साधक कोई अघोर था

भांति भांति के स्‍वर होते थे, महानिशा का नहीं छोर था

तंत्र, मंत्र और यंत्र सम्मिलित सभी क्रियाएं बड़ी विलक्षण


क्षरण हो रहा था जीवन का बिंदु बिंदु तब उस अनंत में

काल गति स्‍तब्‍ध खड़ी थी सिर्फ मौन था दिग्‍दिगंत में


इस बीच समय का पहिया घूमता है, कैलेंडर के हिसाब से दिसंबर २००० का समय है। इतिहास फ़िर से अपनीडायरी में कुछ लिखता है। शहनाइयां बज रही हैं। कोई कवि डोली में बैठे दुल्हन के मनोभावों को पढ़ने की कोशिशकर रहा है-

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समय आगे बढ़ता है। कठोर साधना ने सरस्वती को प्रसन्न कर दिया है। सरस्वती परी और पंखुड़ी नाम से दोवरदान देती हैं इस समर्पित साधक को। अब लेखनी सिर्फ़ कविताओं/गज़लों तक सीमित नहीं रहना चाहती। नदी, तटबंधों को पार कर आगे बढ़ गई है। लेखक के व्यंग्य लेख चाव से पढ़े जाने लगे हैं। कहानियां पहचान देने लगी हैं। ईस्ट-इंडिया कंपनी के माध्यम से ज्ञानपीठ भी लेखक की प्रतिभा का लोहा मान लेती है। इतिहास कलम उठाताहै और सभी चिन्हित स्थानों के आगे पंकज सुबीर लिख देता है।





Thursday, October 1, 2009

रोजी-रोटी के चक्कर ने....

सबसे पहले तो क्ष्मा-प्रार्थी हूं, लंबी अनुपस्थिति के लिये। इस बीच यूं तो काफ़ी कुछ हुआ और मर्मांतक पीड़ा हुई गौतम जी के बारे में जानकर। हां उनकी स्थिति में अपडेट जानकर राहत भी हुआ और ऊपरवाले के प्रति श्रद्धा भी। एक अच्छी बात ये भी है कि गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी पुनः सक्रिय हो गये हैं ब्लागजगत में। तो आइये एक गज़ल पढ़ें जो उनके ही हाथों संवारी गई है फ़िर भी कोई त्रुटि रह गई हो तो वो मेरी अपनी है।


बाज लगे चिड़ियों से डरने
फूंका मंतर जादूगर ने

सच से कितना प्यार है उसको
समझाया उसके पत्थर ने


ढूंढ रहे हल ताबीजों में
अक्‍ल गई क्‍या चारा चरने

बाबूजी की उम्र घटा दी

रोजी-रोटी के चक्कर ने

पाप बढ़ा जब हद से ज्‍यादा

तब फूंकी लंका वानर ने

धरती ने जब ज़िद ठानी है
मानी हैं बातें अंबर ने


ज़हर भरा है यमुना-जल में
डेरा डाला फ़िर विषधर ने

बांट दिया है इन्‍सानों को
मंदिर, मस्ज़िद, गिरिजाघर ने

कौन उठाये अब गोवर्धन

धमकाया फ़िर है इंदर ने

रिश्वत से इंकार किया तो

बरसों लटकाया दफ्तर ने

धर्म बिका जब बाज़ारों में
पीट लिया माथा ईश्वर ने

Monday, September 14, 2009

विष और अमृत दोनों ही हैं शामिल मेरे गीतों में

आज हिंदी-दिवस है। हिंदी-दिवस की सार्थकता लंबी-चौड़ी बयानबाजी में नहीं है इसलिये बेहतर है हिंदी में कुछ लिख-पढ़कर इसे मनाया जाये। तो आज पेश है ये गीत आपकी सेवा में, जीवन के विरोधाभासों को समेटे हुये। मैं विध्वंस और सृजन दोनों को जरूरी मानता हूं। खेत से खर-पतवारों को तो हटाना ही है लेकिन, बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती बल्कि, फूलों के बीज भी रोपने हैं। इन्ही दो स्वरों को पिरोने की कोशिश की है-


उर-सागर के मंथन का है हासिल मेरे गीतों में
विष और अमृत दोनों ही हैं शामिल मेरे गीतों में

एक तरफ मैं बातें करता बरछी, तीर, कटारों की

काली का करवाल, साथ में बहते शोणित-धारों की
क्षार-क्षार करने को आतुर दहक रहे अंगारों की

टूट-टूट कर पल-पल गिरते सत्ता के दीवारों की

दूजे पल मैं राह दिखाता भटक रहे नादानों को
सत्य, अहिंसा और प्रेम की मंजिल मेरे गीतों में

कभी प्रीत की डोर बांधती, तो कभी भौंरा आजाद
कभी काल की कुटिल हास है कभी देवता का प्रसाद
बैठ कुटी में कभी लिखा है साग औ’ रोटी का स्वाद
कभी कलम का साथ निभाती है विविध व्यंजन की याद

है एक ओर विज्ञान-जनित नगरों का वैभव विशाल
वहीं खेत औ’ खलिहानों की मुश्किल मेरे गीतों में

शंखनाद कर स्वप्न तोड़ता बरबस तुम्हे जगाता हूं

नयनों में आंसू भर-भर कर रोता और रुलाता हूं

रास-रंग सब छोड़ प्यास के दारुण गीत सुनाता हूं
पर प्यासे अधरों की खातिर ये भी खेल रचाता हूं

जाम, सुराही, साकीबाला, पीनेवालों की टोली
सजी हुई है पूरी-पूरी महफिल मेरे गीतों में