Saturday, July 4, 2009

वो दिन गए जब रखते थे आंखों में हया लोग

वैसे तो मैं कोई ढंग का शायर नहीं हूं, वो तो हृदय की संवेदना है जो शब्दों में उतर आती है और फ़िर गुरूजन उसे कहने लायक बना देते हैं। पढ़िये एक गज़ल जो आज ही मुकम्मल हुई है गुरूदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से।

रफ़्तार के इस दौर में भूले हैं वफ़ा लोग
सोचो जरा सब पा के भला पाए हैं क्या लोग

महफ़ूज रहेगा ये चमन कितने दिनों तक
जब रोज यहां देते हैं शोलों को हवा लोग

पूछा कभी हाल भी जिन्दा था वो जब तक
मरने पे जुटी भीड़, करें शोक-सभा लोग

मां बाप के संग बार में जाने लगे बेटे
वो दिन गए जब रखते थे आंखों में हया लोग

था खूब मगर वक्त हथेली से यूं फ़िसला
महसूस हैं करते अभी तक खुद को ठगा लोग

रवि इन से कभी प्यार की उम्मीद रखना
हर मोड़ पे देते हैं यहां जख्म नया लोग

16 comments:

ओम आर्य said...

रवि इन से कभी प्यार की उम्मीद न रखना
हर मोड़ पे देते हैं यहां जख्म नया लोग

bahut hi sahi kaha aapane ..............isame koee shaka nahi hai........sundar

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया रचना

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब भईया, एक आज का सच लिखा आप ने.
धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

रवि जी जो इंसान दिल से शायरी करता है वो ही ढंग का शायर होता है और आप किसी से कम नहीं...

मां बाप के संग बार में जाने लगे बेटे
वो दिन गए जब रखते थे आंखों में हया लोग

वाह...बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने...मेरी दाद कबूल करें...सारे शेर बेहद असरदार हैं...

नीरज

"अर्श" said...

GURU BHAEE KYA KHUB ASARDAAR SHE'R KAHE HAI AAPNE... MAULIK BHAVNAAWON KO APNE SAATH RAKHAA HAI AAPNE HAR SHE'R ME ,AUR JO SHAYEER APNEE GAZALON ME SHE'RO ME SAMSAAMAYEEK AUR MAULIKATAA KO JAGAH NAHI DETA WO THAGATA HAI PAHALE TO KHUD KO FIR DUSARON KO BHI AUR SAATH ME SAHITYA KO BHI....AB SHE'R KI SACHCHAAYEE HI DEKHI JAYE TO KYA MAJAAL KE DIL SE WAAH WAAH NAA NIKLE...

मां बाप के संग बार में जाने लगे बेटे
वो दिन गए जब रखते थे आंखों में हया लोग

BAHOT BAHOT BADHAAYEE ..


ARSH

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक बेहतरीन ग़ज़ल के हर शेर लाजवाब।

venus kesari said...

पूछा न कभी हाल भी जिन्दा था वो जब तक
मरने पे जुटी भीड़, करें शोक-सभा लोग

मां बाप के संग बार में जाने लगे बेटे
वो दिन गए जब रखते थे आंखों में हया लोग

था खूब मगर वक्त हथेली से यूं फ़िसला
महसूस हैं करते अभी तक खुद को ठगा लोग

रवि इन से कभी प्यार की उम्मीद न रखना
हर मोड़ पे देते हैं यहां जख्म नया लोग

वाह रवि भाई क्या शेर कहे दिल खुश हो गया
मैं तो आपकी गजलगोई का कायल हूँ

वीनस केसरी

अनिल कान्त : said...

वाह मजा आ गया

दिगम्बर नासवा said...

पूछा न कभी हाल भी जिन्दा था वो जब तक
मरने पे जुटी भीड़, करें शोक-सभा लोग

रवि जी......... बहूत ही मासूम ग़ज़ल है आपकी........... जीवन का रंग समाया है इसमें..........लाजवाब लिखा है

योगेन्द्र मौदगिल said...

बढ़िया... नहीं बेहतरीन... वाह..

संजीव गौतम said...

पूछा न कभी हाल भी जिन्दा था वो जब तक
मरने पे जुटी भीड़, करें शोक-सभा लोग
बहुत सुन्दर शेर. पूरी ग़ज़ल असरदार बधाई.

कंचन सिंह चौहान said...

वो दिन दूर नही जब ये भी औपचारिकता समाप्त हो जायेगी..! सटीक शेर लिखे आपने..!

ताऊ रामपुरिया said...

वाह बहुत ही लाजवाब गजल.शुभकामनाएं.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

वाह बहुत ही लाजवाब गजल.शुभकामनाएं.

रामराम.

sa said...

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aa said...

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