Tuesday, June 16, 2009

मैं पूजा की थाली, का एक फूल हूं...

(फोटो गूगल से साभार)

श्वास की हर ऋचा है, समर्पित तुम्हे
अब कहां शेष रहती, कोई साधना
रूप-जल से नहाकर, नयन तृप्त हैं
हो गई आज पूरी, हर इक कामना

याद दीपक बनी जब, डंसा रात ने
विष से मुक्ति दिलाई, सुमधुर बात ने
छू दिया तुमने और, मैं सोना हुआ
कि मान मेरा बढ़ाया, तेरे हाथ ने

हैं अयाचित सभी सुख, जब मुझको मिले
फ़िर नहीं अब जरूरी, कोई याचना

रात और दिन तुमको, मैं निरखा करूं
ये भी सौभाग्य जो, चरणों में मरूं
तुम पर तन मन औ धन, निछावर है सब
तुम्हारे सिवा कहो, अब किसको वरूं

मैं पूजा की थाली, का एक फूल हूं
पास तुम्हारे रहूं, इतनी प्रार्थना

Saturday, June 6, 2009

राधा और कृष्ण के प्रश्नोत्तर में छिपी प्रेम की एक अनूठी दास्तान

जब-जब प्रेम की बात चलती है कुछ नाम जेहन में अनायास आ जाते हैं। जैसे लैला-मजनूं, शीरी-फ़रहाद, ढोला-मारू आदि। यह भी सच है कि प्रेम की ऐसी भी मिशालें रही हैं जो अपेक्षाकृत कम चर्चित रही हैं-जैसे ऊषा और अनिरुद्ध का प्यार। ऊषा, वाणासुर की लड़की थी और अनिरुद्ध कृष्ण के पौत्र। ऊषा को एक रात सपने में कोई युवक दिखता है और उसकी याद जागने पर भी भूलाये नहीं भूलती। चित्रलेखा, ऊषा की सहेली थी जो संसार के हर पुरूष-स्त्री का चित्र खींचने और उसके बारे में बता पाने की सामर्थ्य रखती थी। फ़िर उसी की मदद से पता चला कि सपने में दिखा युवक अनिरूद्ध है और बात आगे बढ़ी। खैर, ये तो प्रसंगवस थोड़ी बातें कह गया। मूलतः आज आपको एक और ऐसी ही कहानी से परिचित कत्रवाता हूं जो है तो कम चर्चित पर प्रेम की अनूठी मिशाल है। दरअसल मेरे लिये ये सप्ताह अत्यंत व्यस्तता भरा रहा। ऐसे ही मुश्किल क्षण में एक लोकगीत की दो-चार पंक्तियां (पूरी तो याद भी नहीं) अचानक कौंध गई और एक मीठे एहसास से मन भर गया। इस पोस्ट का जन्म इस गीत में छिपे दास्तान से ही हुआ है जो राधा और कृष्ण के प्रश्नोत्तर में निहित है। ये गीत कभी पूरा मिल सका तो सुनवाऊंगा फ़िलहाल तो कहानी का आनंद लीजिये। ऐसा हुआ कि एकबार राधा के मन में संशय हुआ कि कृष्ण बांस की बांसुरी क्यों बजाते हैं? उन्होने कहा कृष्ण से कि आप तो सक्षम हैं, सामर्थ्यवान हैं, अपने लिये सोने की बंशी क्यों नहीं बनवा लेते? ये क्या गरीबों की तरह बांस की बांसुरी.......और फ़िर कृष्ण ने जो उत्तर दिया वह सदियों-सदियों तक सहेजकर रखे जाने योग्य है। हमारे यहां एक जाति होती है-डोम। एक दलित जाति है जहां पुरुउष डोम कहलाते हैं और औरतें डोमिन (राजा हरिश्चंद्र डोम के घर ही बिके थे)। बांस का डाला बनाना, मुर्दे को आग देना जैसे काम डोम ही करते हैं। किसी समय में एक डोमिन कृष्ण से प्रेम कर बैठती है। कहां एक राजा और कहां एक डोमिन! पर प्रेम तो एक बेबूझ पहेली है। यहां वो सब घटित होता है जो समझ और उम्मीद से परे हो। आज तक कौन जान सका है इसे। किसी ने कहा है-

वल्लाह रे ये हुस्न की पर्दागिरी तो देखिये
भेद जिसने खोलना चाहा वो दीवाना हुआ

तो आखिर भेद खुल नहीं पाया। प्रेम के मामले में भी ये सौ फ़ीसदी सत्य है। खैर, तमाम विसंगतियों के बावजूद कृष्ण ने इस प्रेम को स्वीकार किया। और जैसा की हर अमर-प्रेम में होता है, दोनों मिल नहीं पाये। कारण चाहे जो भी रहा हो.....और कृष्ण ने बांस की बांसुरी को हमेंशा के लिये होठों से लगा लिया....कृष्ण बोलते रहे, राधा सुनती रहीं....कई बार सोचता हूं क्या आज कोइ प्रेमी अपनी प्रेमिका के समक्ष खुले मन से किसी और से प्रेम की बात कर पायेगा? और करे भी तो क्या प्रेमिका सहज भाव से स्वीकार कर पायेगी?

Friday, May 29, 2009

हौले हौले जहर कोई जिस्‍म में घुलता रहा...

सुनिये एक और गज़ल। गुरूदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद के बिना इसे पूरा करना संभव नहीं था।


मुश्किलों से राह की हंस कर गले मिलता रहा
मैं कि था बस इक मुसाफ़िर उम्र-भर चलता रहा


सत्‍य के उपदेश का व्‍यापार करते जो रहे
झूठ उनके साये में ही फूलता फलता रहा

दुख मिटाने के लिये कोई मसीहा आएगा
आदमी यूं रोज अपने आप को छलता रहा

वक्‍त को पहचानने में भूल जिसने भी है की
कुछ नहीं वो पा सका, बस हाथ ही मलता रहा

सच यही है, जिंदगी तुम बिन अमावस हो गई
चांद यूं कहने को आंगन में सदा खिलता रहा

जैसे जैसे निष्‍कपट बच्‍चे बड़े होते गये
हौले हौले जहर कोई जिस्‍म में घुलता रहा

कैसे लिखता प्‍यार की ग़ज़लें मैं उसको देख कर
वो भिखारी रात भर चादर फटी सिलता रहा


सोचता था वो छुएगा अब नई ऊंचाइयां
किन्तु सूरज जाके पश्चिम में यूं ही ढलता रहा

(2122 2122 2122 212)


Link

Monday, May 25, 2009

हर इक युग में यही सुकरात का अंजाम होता है...

गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से यह गज़ल कहने लायक हो पाई है। पिछले दिनों गुरूजी ने एक आक्रोश भरा पोस्ट लिखा था और बताया था कि वे मंदिर क्यों नहीं जाते। उनको समर्पित एक शेर भी शामिल है इस गज़ल में। तो पढ़िये और आशीर्वाद दीजिये-

सुना है के मुहबबत में अजब ये काम होता है
लबों पर हर घड़ी केवल उसी का नाम होता है


न आती नींद रातों को, न मिलता चैन है दिन को
हुआ गर इश्क फ़िर यारों कहां आराम होता है

इधर सच बोलता है वो उधर प्याला जहर का है
हर इक युग में यही सुकरात का अंजाम होता है

बड़ी तकलीफ़ होती है कलेजा मुंह को आता है

सरे बाज़ार जब कोई हुनर नीलाम होता है

नहीं कुछ पाप सत्ता को, नियम उसपर नहीं चलता

करे वो क़त्‍ल भी तो वो भी पावन काम होता है

जला दो इस व्‍यवस्‍था को जहां इतनी विषमता है
सुबह रोटी कहीं दुर्लभ कहीं बादाम होता है


मुझे मंदिर से क्‍या लेना मुझे माला से क्‍या मतलब
मिरा दिल खुद ही मधुबन है जहां पर श्‍याम होता है


मिरी खुशकिस्‍मती पर क्‍यों नहीं हो रश्‍क दुनिया को
गली में यार की क्या हर कोई बदनाम होता है


सियासत की मिरे भाई बड़ी उल्टी कहानी है
बड़ा वो ही है जिसके सर बड़ा इल्‍ज़ाम होता है

(१२२२ x ४)

Wednesday, May 20, 2009

बस कुछ यूं ही....

एक-दो दिन में नई गज़ल लगाता हूं तब तक कुछ फ़ुटकर आपके लिये हाज़िर है।


(१)
हाथ पर हाथ धरे, बैठे-बैठे सोचते हैं
दैववश अच्छे दिन, सबके ही आते हैं
भाग्यवादी कायरों की, यही है पहचान कि
बाबा वो मलूकदास, मन को लुभाते हैं
जड़-बुद्धि जनता की, दिशाहीन सोच का जी

अवसरवादी नित, फायदा उठाते हैं
धर्म-धुरंधर और, वाहक परंपरा के
नागपंचमी तो हम, रोज ही मनाते हैं

(२)
जब-जब चलाई है, उसने बंदूकें तब
इस्तेमाल अपने ही, कंधे होते आये हैं

लूटपाट आगजनी, धूर्त्तता मक्कारी छल

सदा बड़े लोगों के ये, धंधे होते आये हैं
झूठ की दुकानदारी, बढ़ गई हर ओर
सच के व्यापार सब, मंदे होते आये हैं

आज भी हैं धृतराष्ट्र, सत्ता के आदर्श तभी
शासक सदैव यहां, अंधे होते आये हैं

Thursday, May 7, 2009

कितने टुकड़ों में मिरा देश है बंटा आखिर

तुलसी पूछते हैं "ऐसो को उदार जग मांहि"। मैं अगर उस समय होता तो गुरूदेव पंकज सुबीर जी का नाम ले देता। जो उदारतापूर्वक मेरी गज़लों को कहने लायक बनाते हैं। पढ़िये एक ताज़ी गज़ल-

फूल क्यूं इक भी नहीं शाख पे दिखता आखिर
कोई बतलाओ के गुलशन को हुआ क्‍या आखिर


प्रांत, भाषा तो कहीं जात, कहीं है मजहब

कितने टुकड़ों में मिरा देश है बंटा आखिर

हर तरफ़ आज तो सय्याद नज़र आते हैं

कैद पिंज़रे में हुई सोने की चिड़िया आखिर


जब भी मौका है मिला पीठ में खंजर भोंका
खूब यारों ने मिरे फर्ज निभाया आखिर


दिल यहां मिलते रहे तोड़ के सारे बंधन
रोक पाया न इन्हे रस्मों का पहरा आखिर

भूख की आग को कुर्सी वो समझती कैसे

खाली, इस ओर, उधर पेट भरा था आखिर


ठौर दुनिया में कोई भी न नज़र आया तो
हारकर रेत का घर एक बनाया आखिर
(२१२२ ११२२ ११२२ २२)

Tuesday, May 5, 2009

यूं है मां के दुलार की बातें

फ़िर हाज़िर हूं एक गज़ल के साथ । आशीर्वाद गुरूदेव पंकज सुबीर जी का है।

यूं है मां के दुलार की बातें
जेठ में ज्यूं फुहार की बातें


वेद कुरआन बाइबल गीता
सब में है सिर्फ़ प्यार की बातें

है चमन के लिये जरूरी ये
साथ गुल के हो खार की बातें

खुश न हो सुन चुनाव के वादे
भूल रंगे सियार की बातें

प्रेम में तो दूई नहीं होता
झूठ है जीत हार की बातें

होश किसके उड़ा न देती हैं
फ़ागुनी मधु-बयार की बातें


ना ढहें मज़हबी दिवारें गर
सच न होंगी सुधार की बातें

इश्‍क में दिल जो टूट जाये तो
हैं रुलातीं बहार की बातें

रख किताबें न मेज़ पर केवल
खोज कुछ उनमें सार की बातें
(२१२२ १२१२ २२)