(फोटो गूगल से साभार)श्वास की हर ऋचा है, समर्पित तुम्हे
अब कहां शेष रहती, कोई साधना
रूप-जल से नहाकर, नयन तृप्त हैं
हो गई आज पूरी, हर इक कामना
याद दीपक बनी जब, डंसा रात ने
विष से मुक्ति दिलाई, सुमधुर बात ने
छू दिया तुमने और, मैं सोना हुआ
कि मान मेरा बढ़ाया, तेरे हाथ ने
हैं अयाचित सभी सुख, जब मुझको मिले
फ़िर नहीं अब जरूरी, कोई याचना
रात और दिन तुमको, मैं निरखा करूं
ये भी सौभाग्य जो, चरणों में मरूं
तुम पर तन मन औ धन, निछावर है सब
तुम्हारे सिवा कहो, अब किसको वरूं
मैं पूजा की थाली, का एक फूल हूं
पास तुम्हारे रहूं, इतनी प्रार्थना

