
द्वार तुम्हारे पहुँचा जब मैं धूप दीप नैवेद्य नहीं था
रीत निभाने की खातिर मैं अपने स्वप्न चढ़ा आया
रस छंद और अलंकार की
कठिन तपस्या हुई न हमसे
चाहा तो था लेकिन मुक्ति
मिली नहीं अंतर के तम से
भर-भर झोली ले जाते सब रिक्त हस्त मैं क्या करता
रूप तुम्हारा नयनों में भर मैं चुपचाप चला आया
निष्फल श्रम था, पटी नहीं
इच्छाओं की गहरी खाई
किस पथ का लूँ आलंबन
बुद्धि ये सोच नहीं पाई
खोकर वय की पूँजी सारी धर्म-ग्रंथ के पन्नों में
सहज हृदय की भाषा को मैं पावन मंत्र बता आया
रीत निभाने की खातिर मैं अपने स्वप्न चढ़ा आया
रस छंद और अलंकार की
कठिन तपस्या हुई न हमसे
चाहा तो था लेकिन मुक्ति
मिली नहीं अंतर के तम से
भर-भर झोली ले जाते सब रिक्त हस्त मैं क्या करता
रूप तुम्हारा नयनों में भर मैं चुपचाप चला आया
निष्फल श्रम था, पटी नहीं
इच्छाओं की गहरी खाई
किस पथ का लूँ आलंबन
बुद्धि ये सोच नहीं पाई
खोकर वय की पूँजी सारी धर्म-ग्रंथ के पन्नों में
सहज हृदय की भाषा को मैं पावन मंत्र बता आया
14 comments:
BAHOT BADHIYA STHAAYEE KE SAATH LIKHAA HAI AAPNE... BADHAYEE AAPKO..
JAI HO...
ARSH
भर-भर झोली ले जाते सब रिक्त हस्त मैं क्या करता
रूप तुम्हारा नयनों में भर मैं चुपचाप चला आया
waah....!! bhot sundar...!!!
बहुत ही सरस गीत लिखा है।
व्याकरण का तो पता नहीं रवि भाई...मगर गीत के शब्द, भाव और प्रस्तुति अकदम अलग और बहुत अच्छी लगी है
बहुत ही उम्दा सृजन!
बेहतरीन भावाभिव्यक्ति के लिये साधुवाद स्वीकारें.. वाह..
खोकर वय की पूँजी सारी धर्म-ग्रंथ के पन्नों में
सहज हृदय की भाषा को मैं पावन मंत्र बता आया
बहुत अच्छा लिखा है। बधाई स्वीकारें।
सुन्दर छंदबद्ध गीत..अच्छा लगा.
अच्छा है गीत एक दो बहुत मामूले से व्याकरणीय दोष हैं जो हल्की सी हथोड़ी मारने पर दूर हो जायेंगें ।
bahut sundar..........
pahli baar aapke blog par aaya..
hindi me likhne aour jiske shabdo me apni poornata ke saath ras bhara ho, artho me poora poora aanand ho, esi rachna he..
saadhuvaad aapko
bahut sundar
बहुत खूबसूरत क्या बात है
पावन शब्दों में पावन भावों की पावन कृति...! आभार..!
सुंदर भावों को सुंदर प्रवाह से सजा दिया आपने। बहुत खूब
Post a Comment