Wednesday, September 17, 2008

ये जो सबसे अलग दिखने की चाह है

आज के दौर की सबसे बड़ी माँग है कि आप अपने आप को मार्केट में कैसे स्थापित कर पाते हैं। और इस वजह से दिखावेपन का धंधा काफ़ी फल-फूल रहा है। पर एक बात तो तय है कि दिखावे में जिन्हे ज्यादा भरोसा है उनमें आत्मविश्वास की कमी है। वरना इतनी चिंता क्यों? फूल खिलता है तो खूश्बू तो फैल ही जाती है । ये जो सबसे अलग दिखने की चाह है इसने कहीं का न छोड़ा। बिना नींव की चिंता किये इमारत की डेन्टिंग-पेन्टिंग से क्या हासिल होनेवाला है? शाखाओं से ज्यादा जड़ों के हिफ़ाजत की जरूरत है। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि कोई अपनी प्रतिभा को दबाए/छुपाए बल्कि उसके बेवजह बिना देश, काल एवं पात्र का ध्यान किये प्रदर्शन और जरूरत से ज्यादा प्रदर्शन उचित नहीं है।

4 comments:

manvinder bhimber said...

aapne itni khobsurat baat itne kam shabdhon mai kah di
apke blog per aana achcha laga

संजय तिवारी said...

परिचय का वन लाईनर बहुत जोरदार है भाई.

शोभा said...

बहुत अच्छा लेख लिखा है. बधाई.

पंकज सुबीर said...

बहुत अच्‍छी बात कही है सूरज को अपना परिचय देने की ज़ुरूरत नहीं होती है कि मैं आ रहा हूं मेरा नाम सूरज कुमार है जब सूरज आसमान पे आता है तो सब जान जाते हैं कि सूरज आ गया है । आज के दौर में सबसे बड़ी समस्‍या ये है कि लोग ख़ुद ही कहते हैं कि मैं ये हूं मैं वो हूं , दूसरों को कहने का मौका ही नहीं देते या यूं कहें कि उनमें कुछ ऐसा होता ही नहीं है कि दूसरे उनका परिचय दें । खैर आपकी एक बात से तो सहमत हूं कि कविता हर कहीं और हर कभी नहीं होनी चाहिये । जो हर कहीं और हर कभी हो जाये वो और कुछ भले ही हो पर कविता तो नहीं हो सकती है ।